पुणे: महाराष्ट्र के पुणे में साइबर ठगी का एक और गंभीर मामला सामने आया है। सहकारनगर इलाके में रहने वाले 72 वर्षीय एक बुजुर्ग से कथित तौर पर ₹27 लाख की ठगी की गई। साइबर अपराधियों ने खुद को सरकारी जांच एजेंसियों के अधिकारी बताकर पीड़ित को कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाया और कई दिनों तक मानसिक दबाव में रखा। इसके बाद अलग-अलग बैंक खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर कराई गई।
मामले की शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस, CBI, ED या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताने वाले लोगों पर तुरंत भरोसा न करें और किसी भी परिस्थिति में उनके कहने पर पैसे ट्रांसफर न करें।
वीडियो कॉल पर बनाया दबाव
पुलिस के अनुसार, पीड़ित बुजुर्ग को साइबर ठगों ने फोन किया और उन्हें बताया कि उनके नाम से जुड़े कुछ दस्तावेज या बैंक खाते कथित तौर पर एक आपराधिक मामले की जांच में सामने आए हैं। इसके बाद आरोपियों ने खुद को सरकारी अधिकारी बताकर उन्हें जांच में सहयोग करने के लिए कहा।
ठगों ने बुजुर्ग को डराया कि यदि उन्होंने उनकी बात नहीं मानी तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इसके बाद उन्हें वीडियो कॉल पर रहने और किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क नहीं करने के लिए कहा गया। इस तरह अपराधियों ने उन्हें डिजिटल अरेस्ट जैसा माहौल बनाकर लगातार निगरानी में रखने का दावा किया।
₹27 लाख अलग-अलग खातों में ट्रांसफर
आरोपियों ने कथित तौर पर बुजुर्ग से कहा कि जांच के नाम पर उनके बैंक खातों में मौजूद रकम की जांच की जाएगी। इसके लिए उन्हें अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने को कहा गया।
डर और मानसिक दबाव के कारण पीड़ित ने कथित तौर पर कुल ₹27 लाख साइबर अपराधियों द्वारा बताए गए खातों में ट्रांसफर कर दिए। बाद में जब उन्हें एहसास हुआ कि वह ठगी का शिकार हो चुके हैं, तो उन्होंने पुलिस से संपर्क किया।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बढ़ रही ठगी
पिछले कुछ समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी के मामले सामने आए हैं। इस तरह के मामलों में अपराधी पुलिस अधिकारी, CBI, ED, RBI या अन्य सरकारी संस्थाओं के अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं।
ठग अक्सर पीड़ित को बताते हैं कि उसका नाम किसी मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, बैंक फ्रॉड या अन्य गंभीर अपराध से जुड़े मामले में सामने आया है। इसके बाद गिरफ्तारी का डर दिखाकर वीडियो कॉल पर रहने और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है।
असल में कोई भी वैध सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को इस तरह ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करती और न ही जांच के नाम पर निजी बैंक खाते में पैसे जमा कराने का आदेश देती है।
पुलिस ने लोगों से सतर्क रहने की अपील की
पुणे पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि यदि किसी अनजान व्यक्ति का फोन आए और वह खुद को पुलिस या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी की धमकी दे, तो घबराएं नहीं। फोन करने वाले की पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें और परिवार के सदस्यों या पुलिस से तुरंत संपर्क करें।
पुलिस का कहना है कि किसी भी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने, OTP साझा करने या अनजान बैंक खाते में पैसे भेजने से बचना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति साइबर ठगी का शिकार हो जाता है, तो जितनी जल्दी शिकायत दर्ज की जाए, पैसे को ट्रेस या फ्रीज कराने की संभावना उतनी ही बढ़ सकती है।
सहकारनगर के इस मामले में पुलिस अब आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और डिजिटल लेन-देन की जांच कर रही है। साथ ही यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस ठगी के पीछे कौन सा गिरोह काम कर रहा था।
यह घटना एक बार फिर बताती है कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डर पैदा करना साइबर अपराधियों का एक खतरनाक तरीका है। इसलिए किसी भी संदिग्ध फोन कॉल पर घबराने के बजाय तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना जरूरी है।
