पुणे: शहर में बढ़ते शोर प्रदूषण को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में पुणे के पुलिस आयुक्त के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि शहर में ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने और निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों को पर्याप्त रूप से लागू नहीं किया गया।
याचिका में दावा किया गया है कि पुणे में सार्वजनिक और धार्मिक आयोजनों, लाउडस्पीकरों तथा अन्य माध्यमों से होने वाले शोर को नियंत्रित करने के लिए कई नियम और न्यायिक निर्देश मौजूद हैं। इसके बावजूद कई इलाकों में निर्धारित ध्वनि सीमा और समय संबंधी नियमों का उल्लंघन जारी है।
कोर्ट के निर्देशों के पालन पर सवाल
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हाईकोर्ट पहले ही ध्वनि प्रदूषण को लेकर प्रशासन और पुलिस को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दे चुका है। इन निर्देशों का उद्देश्य नागरिकों को अत्यधिक शोर से होने वाली परेशानी से राहत दिलाना और ध्वनि प्रदूषण के नियमों को प्रभावी तरीके से लागू करना था।
हालांकि, याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन निर्देशों के बावजूद पुणे शहर में स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। कई स्थानों पर देर रात तक तेज आवाज में लाउडस्पीकर और अन्य ध्वनि उपकरणों के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आती रही हैं।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आग्रह किया है कि मामले को गंभीरता से लिया जाए और संबंधित अधिकारियों से यह पूछा जाए कि अदालत के निर्देशों को लागू करने में कथित तौर पर लापरवाही क्यों हुई।
पुलिस प्रशासन की भूमिका पर सवाल
अवमानना याचिका में पुणे पुलिस आयुक्त की भूमिका को लेकर विशेष रूप से सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस के पास ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों को लागू करने और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के पर्याप्त अधिकार हैं, लेकिन इनका प्रभावी इस्तेमाल नहीं किया गया।
याचिका के अनुसार, केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। पुलिस और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ समय पर कार्रवाई हो। विशेष रूप से रात के समय तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाने और निर्धारित मानकों से अधिक शोर करने की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता बताई गई है।
नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता
ध्वनि प्रदूषण केवल असुविधा का विषय नहीं है, बल्कि लंबे समय तक अत्यधिक शोर का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। तेज आवाज के कारण नींद में परेशानी, तनाव और एकाग्रता प्रभावित होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों पर इसका प्रभाव अधिक महसूस हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसी वजह से अदालत द्वारा ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। उनका उद्देश्य नागरिकों के शांतिपूर्ण और सुरक्षित वातावरण के अधिकार की रक्षा करना है।
हाईकोर्ट के रुख पर नजर
अब इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख महत्वपूर्ण होगा। अदालत यह देख सकती है कि उसके पहले दिए गए निर्देशों का पालन किस स्तर तक हुआ और संबंधित अधिकारियों ने उन्हें लागू करने के लिए क्या कदम उठाए।
यदि अदालत को लगता है कि उसके आदेशों का जानबूझकर या पर्याप्त रूप से पालन नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जा सकता है और आगे की कार्रवाई पर विचार हो सकता है।
फिलहाल पुणे में शोर प्रदूषण का मुद्दा एक बार फिर न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। पुलिस प्रशासन द्वारा ध्वनि प्रदूषण के नियमों को लागू करने की कार्रवाई और हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई पर शहरवासियों की नजर रहेगी।
